*प्रोग्रेस रिपोर्ट दिखाने के चक्कर में हितग्राहियों का मारा जा रहा हक*

गरियाबंद। (सियासत दर्पण न्यूज़) छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में अधूरे पीएम आवास को पूर्ण बताने का खेल अब भी जारी है. अब तक 2000 अधूरे आवास को पूर्ण बताया. इसलिए इसमें निर्माण के लिए मनरेगा से दी जाने वाली 3 करोड़ से ज्यादा मजदूरी राशि लेप्स हो गई.

जिले में केंद्र सरकार की योजना पीएम आवास के झूठे प्रोग्रेस रिपोर्ट दिखाने पिछले तीन माह से सैकडो अधूरे आवास को पूर्ण हो चुके दूसरों के आवास के आगे हितग्राहियों को खड़ा कर पूर्ण बताया गया.इससे अफसरों ने राहत की सांस तो ले ली पर इस बोगस जियो टैगिंग के चक्कर में आवास निर्माण के लिए स्वीकृत मनरेगा मजदूरी के करोड़ों रुपए लेप्स हो गए.

दरअसल योजना में तय प्रावधान के मुताबिक, आवास के लिए 1.20लाख के अलावा सरकार ने निर्माण के लिए मनरेगा के तहत 90 दिवस मजदूरी यानी 23490 रुपए का प्रावधान किया था. लेकिन जिले में आवास पूर्ण कर चुके 2हजार से ज्यादा हितग्राहियों का 3 करोड़ से ज्यादा मनरेगा मजदूरी रकम लेप्स कर दिया गया है. यह रुपए आवास निर्माण के प्रगति के आधार पर चरण बद्ध तरीके से मनरेगा योजना से मस्टरोल जनरेट करने के बाद भुगतान किया जाना था, लेकिन निर्माण की प्रगति कागजों में दिखाने के लिए मजदूरों का हक मारा गया.

देवभोग जनपद के 53 पंचायत में आवास प्रगति रिपोर्ट की जानकारी की पड़ताल की गई. जिसमें सामने आया कि यहां स्वीकृत 6850 आवास में से 2236 आवास 15 जुलाई तक पूर्ण बताए गए. जिन्हें आवास की मंजूरी राशि का पूर्ण भुगतान किया गया. लेकिन जून जुलाई में पूर्ण बताए गए 261 आवास ऐसे हैं, जिन्हें 23490 के दर पर 90 दिन का 61 लाख 30 हजार रुपए का भुगतान नहीं किया गया.

इसी अवधि में पूर्ण हुए 272 आवास का 60 दिन की राशि जो 42 .43 लाख से ज्यादा होता है, उसे भुगतान करने के बजाए लेप्स कर दिया गया. मनरेगा रिकॉर्ड के मुताबिक जिले में ऐसे 2000 आवास हैं, जिसमें काम करने वाले मजदूरों को 3 करोड़ से ज्यादा का भुगतान होना था, लेकिन नहीं किया गया.

मनरेगा के जिला समन्वयक बुद्धेश्वर साहू ने बताया कि आवास निर्माण के बाद हितग्राहियों द्वारा राशि की मांग की जानी चाहिए थी. समय पर नहीं किए होंगे, इसलिए मस्टरोल जनरेट नहीं हुए. उन्होंने आगे कहा कि आवास पूर्णता का CC जारी होने के बाद मजदूरी की रकम दिया जाना सम्भव नहीं है. हालांकि अब हम बगैर मांग के भी स्वतः संज्ञान लेकर मजदूरी भुगतान करवा रहे हैं.

बता दें, 19 मई को हमने खुलासा किया था कि कैसे आवास प्रगति बताने के लिए बोगस जियो टैगिंग किया जा रहा है. इसके बाद मामले में प्रदेश स्तर पर जांच हुई और मामले की पुष्टि भी हुई. कार्रवाई करते हुए तीन आवास मित्रों को हटाने की खानापूर्ति भी की गई. लेकिन, इस अहम योजना में कमजोर कड़ी के कई किरदार को छोड़ दिया गया. इस कारण से कार्रवाई के बाद भी बोगस जियो टैगिंग का खेल जारी रहा.

जुलाई में बरबहली के गिरधारी सोरी को छोटे भाई प्रेम के पूर्ण हो चुके आवास में जियो टैगिंग किया गया. सरगिगुड़ा के बलभद्र को उसके मां सोनाबती के आवास में, तो सिद्धेश्वर को पड़ोसी के घर के सामने खड़ा कर जियो टैगिंग किया गया.

आवासों की प्रोग्रेस रिपोर्ट दिखाने के लिए जिम्मेदारों ने कई ग्रामीणों के अधूरे आवासों को गलत तरीके से पूर्ण बता दिया. कदली मूड़ा के तुलेश, सीतलीजोर के पद्मनी नागेश, भूषण नागेश,हिरण नागेश, फलसापारा के सदन राम, घोघर के कमलू राम, खेदू राम बघेल, ऊपर पिटा के बालसिंग, बाड़ीगांव के मंगल राम, बरकानी के दशाय बाई, सिनापाली का भोजराम समेत 500 से ज्यादा हितग्राहियों के अधूरे आवास को बोगस जियो टैगिंग कर पूर्ण बता दिया गया.

जिले के सभी जनपदों में इस तरह का फर्जीवाड़ा कर 2 हजार से अधिक हितग्राहियों का बोगस जियो टैगिंग कर आवास को पूर्ण बताया गया. लेकिन वाहवाही लूटने के लिए जिले के जिम्मेदार अफसर अनदेखी करते रहे.

गरियाबंद जिला पंचायत के CEO घासी राम मरकाम ने इस मामले में कहा कि जियो टैगिंग की जिम्मेदारी आवास मित्रों की थी. इसलिए आवास मित्रो पर कार्रवाई की गई. आप बताइए कहां-कहां और गलती की गई है, हम कार्यवाही करेंगे.

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