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*बदले की आग में बुझे प्यार के रिश्ते, मुठभेड़ में खत्म हुई कहानी*

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जगदलपुर।(सियासत दर्पण न्यूज़) कांकेर के माचपल्ली-आरामझोरा-हिडूर के घने, नम और खामोश जंगलों में सोमवार की सुबह गोलियों ने एक ऐसी प्रेम कहानी का अंतिम अध्याय लिख दिया, जो कभी इन्हीं जंगलों में जन्मी थी।

धुएं के छंटने के बाद जमीन पर पडृा था एसीएम कमांडर रूपी का निर्जीव देह। पास में पिस्टल, बिखरे कारतूस… और एक ऐसा अतीत, जिसे अब कोई नहीं पढ़ पाएगा।
रूपी और विजय रेड्डी, दोनों तेलुगू कैडर से थे

रूपी और विजय रेड्डी, दोनों तेलुगू कैडर, वर्षों पहले माओवादी संगठन की विचारधारा से प्रभावित होकर जंगलों की दुनिया में आए थे। आंध्र-तेलंगाना के सीमांत इलाकों से निकलकर वे बस्तर पहुंचे, जहां बंदूक और भरोसा ही जीवन का आधार था।

एक ही दस्ता, एक ही राह, और हर दिन मौत से सामना। इन्हीं हालातों में दोनों एक-दूसरे के करीब आए। न कोई इजहार, न कोई रस्म, लेकिन यह रिश्ता धीरे-धीरे इतना गहरा हुआ कि संगठन के भीतर ही उन्होंने साथ जीने-मरने का निर्णय ले लिया।

मानपुर–मोहला मुठभेड़ ने इस कहानी को तोड़ दिया

यह प्रेम उन चुप रातों में पनपा, जब दूर कहीं फायरिंग होती थी और पास में बस एक-दूसरे की मौजूदगी सुकून देती थी। लेकिन 2025 की मानपुर–मोहला मुठभेड़ ने इस कहानी को तोड़ दिया। विजय की मौत ने रूपी के भीतर कुछ स्थायी रूप से बदल दिया।

उसके सामने समर्पण का रास्ता खुला था, सरकार की पुनर्वास नीति, नई जिंदगी का अवसर। मगर उसने वह राह नहीं चुनी। उसने बदले को चुना।
…और इस बार रूपी भी गिर पड़ी

कहते हैं, इसके बाद रूपी की आंखों में विचारधारा नहीं, सिर्फ दर्द दिखता था। हर आपरेशन, हर मूवमेंट… जैसे किसी अधूरे हिसाब की तलाश। और फिर 13 अप्रैल 2026 को उसी जंगल में गोलियां चलीं। इस बार रूपी भी गिर पड़ी।

यह कहानी कोई जीत नहीं बताती। यह सिर्फ याद दिलाती है कि हिंसा अंततः सब कुछ छीन लेती है। प्रेम भी, जीवन भी, और भविष्य भी।
अब बंदूक से संवाद की ओर बस्तर

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के माओवादी हिंसा के खात्मे का लक्ष्य तय किए जाने के बाद बस्तर में माओवादी हिंसा अब अंत की ओर है। सुरक्षा बलों की रणनीति, सड़कों का विस्तार और आत्मसमर्पण नीति के असर से संगठन कमजोर पड़ा है। बसव राजू, चलपति, हिड़मा, कोसा, गुड़सा उसेंडी जैसे शीर्ष माओवादी मारे जा चुके हैं।

बस्तर अब एक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है

भूपति और देवजी जैसे कई बड़े चेहरों ने मुख्यधारा में लौटकर नई शुरुआत की है। बस्तर अब एक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है, जहां बंदूक की जगह संवाद ले रहा है। जंगलों में अब सिर्फ गोलियों की गूंज नहीं, बल्कि शांति की उम्मीद भी सुनाई देने लगी है। आने वाले समय में यहां प्रेम कहानियां खून से नहीं, जिंदगी से लिखी जाएंगी।

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