बालोद।(सियासत दर्पण न्यूज़) छत्तीसगढ़ के डौंडीलोहारा अंचल में स्थित मरकामटोला गांव की गलियों में आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा किसी अनहोनी का नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवंत रिश्ते के टूट जाने का है, जो इंसान और मूक पशु के बीच की दीवार को ढहा चुका था। वर्ष 2014 में जब ‘नंदी महाराज’ ने इस गांव में कदम रखा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि वे सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि इस गांव की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान बन जाएंगे।
ग्रामीणों के लिए वे केवल एक बैल नहीं थे; वे साक्षात भगवान शिव के वाहन थे। वर्षों तक उन्होंने गांव की गलियों को अपनी पदचाप से पवित्र किया। हर सुबह जब सूरज की पहली किरण गांव को छूती, नंदी महाराज की उपस्थिति किसी सांत्वना की तरह महसूस होती थी। ग्रामीणों ने उन्हें अपने परिवार के सदस्य की भांति स्नेह दिया, और उन्होंने बदले में गांव को अपनी मूक सात्विकता प्रदान की।
रुक गए गांव के हल, करुणा के प्रति कृतज्ञता
रविवार का दिन गांव के लिए काल बनकर आया। जब उनके निधन का समाचार फैला, तो मानों गांव का हर घर शोक की लहर में डूब गया। कामकाज ठप पड़ गए, खेत-खलिहानों में हल रुक गए और सारा गांव एक साथ अपने उस साथी को विदा करने उमड़ पड़ा, जिसे वे वर्षों से पूजते आए थे। ढोल-नगाड़ों की गूंज और ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष के बीच निकली उनकी अंतिम यात्रा किसी साधारण पशु की विदाई नहीं थी। यह एक ऐसी विदाई थी जो मनुष्य की करुणा और कृतज्ञता को अभिव्यक्त कर रही थी।
आंखे छलकी, मस्तक झुकाकर अर्पित की श्रद्धांजलि
पुराने गौठान में पूरे विधि-विधान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई, तो वृद्धों की आंखें छलक आईं और युवाओं ने मस्तक झुकाकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। मरकामटोला की मिट्टी में अब नंदी महाराज का शरीर तो नहीं है, लेकिन उनकी स्मृति गांव के कण-कण में बस गई है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि जब प्रेम और आस्था का भाव हो, तो मनुष्य और पशु के बीच का अंतर मिट जाता है, और निस्वार्थ सेवा का यह बंधन मृत्यु के बाद भी जीवंत रहता है।






