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*एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध साबित करने के लिए अब चाहिए वैध जाति प्रमाणपत्र: हाई कोर्ट*

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बिलासपुर। (सियासत दर्पण न्यूज़) हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध साबित करने के लिए पीड़ित का वैध जाति प्रमाणपत्र होना अनिवार्य है।

जस्टिस एनके व्यास की एकलपीठ ने 21 साल पुराने मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से रद करते हुए छह महीने की सजा समाप्त कर दी, जबकि जुर्माने की राशि 500 रुपये से बढ़ाकर दो हजार रुपये कर दी।
राशि प्रत्येक याचिकाकर्ता को जमा करनी होगी

यह राशि प्रत्येक याचिकाकर्ता को जमा करनी होगी। मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर हुए विवाद के दौरान आरोपितों ने जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी।

पुलिस ने आइपीसी की धाराओं 294, 323, 506/34 और एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत मामला दर्ज कर चालान पेश किया। सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपितों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।

आरोपितों ने फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी

आरोपितों ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि शिकायतकर्ता का जाति प्रमाणपत्र केवल तहसीलदार द्वारा जारी अस्थायी प्रमाणपत्र था, जो सक्षम प्राधिकारी का नहीं था। इसलिए इसे वैध नहीं माना जा सकता।
केवल मौखिक दावे पर्याप्त नहीं, ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी

कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि केवल मौखिक दावे पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक है। कोर्ट ने वैध जाति प्रमाणपत्र के अभाव में धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध सिद्ध नहीं माना।

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