जगदलपुर।(सियासत दर्पण न्यूज़) खेती-किसानी का काम शुरू होते ही वाटरकाक पक्षी जिसे बस्तर की स्थानीय हल्बी-भतरी बोली में कपकपिया कहते हैं नजर आने लगे हैं। वाटरकाक का वैज्ञानिक नाम गेलिक्रैक्र्स सिनेरिया है। इसे दुर्लभ माना जाने लगा है कि क्योंकि इनकी संंख्या कम हो रही है।
पानी की बोतल उलटकर खाली करने जैसी आवाज
प्रजनन काल में कपकपिया पक्षी पानी का बोतल उलट करके खाली करने जैसी आवाज निकालते हैं। शासकीय केपीजी कालेज धरमपुरा के प्राणी विज्ञान के प्रोफेसर सुशील दत्ता बीते 35 सालों से पक्षियों पर अध्ययन कर रहे हैं। दो दिन पहले दलपत सागर के समीप खेत में उन्होंने इसकी तस्वीर मोबाइल पर कैद की। उन्होंने बताया कि यह बहुत ही एकांत प्रिय पक्षी है। कभी-कभी यह खुले में दिखते हैं। धान के खेत में घास के बीच में यह अपना भोजन तलाशते हैं। इनका मुख्य भोजन कीड़े, छोटे घोंघे और छोटे मेंढक होते हैं। प्रजनन काल के बाद यह घने घास के बीच में सुरक्षित स्थान में छुप जाते हैं और वर्ष भर दिखाई नहीं पड़ते क्योंकि आवाज भी नहीं निकालते। — –
आवाज का आकर्षण
प्रोफेसर सुशील दत्ता बताते हैं कि यह दुर्लभ और आकर्षक पक्षी है। इसकी आवाज भी आकर्षण का कारण बनती है। नर काला और भूरे रंग का होता है इसके सिर पर एक मांसल उभार और चोंच पीले रंग की होती है। मादा अमूमन शांत रहती है और भूरे कत्थे रंग की होती है। प्रोफेसर सुशील दत्ता का कहना है कि गेलिक्रैक्र्स वंश का इकलौता सदस्य हेने से इसके संरक्षण की जरूरत है। कपकपिया पक्षी के व्यवहार आमतौर पर अन्य पक्षियों से थोड़ा अलग होता है। ये केवल बरसात के समय खेतों में नजर आते हैं इसलिए इस पक्षी पर अध्ययन की भी जरूरत है।






