Home / छत्तीसगढ़ / *कांकेर के जेपी इंटरनेशनल स्कूल में “लेट फीस” की मनमानी: शिक्षा बन रहा है व्यापार,,शिक्षा विभाग ने साधी चुप्पी,,,,,गणेश तिवारी कांकेर की रिपोर्ट*

*कांकेर के जेपी इंटरनेशनल स्कूल में “लेट फीस” की मनमानी: शिक्षा बन रहा है व्यापार,,शिक्षा विभाग ने साधी चुप्पी,,,,,गणेश तिवारी कांकेर की रिपोर्ट*

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गणेश तिवारी कांकेर की रिपोर्ट

गरीब अभिभावकों पर भारी पड़ रही है निजी स्कूलों की तानाशाही

कांकेर,सियासत दर्पण न्यूज़,शिक्षा को समाज में एक सेवा के रूप में देखा जाता है—एक ऐसा माध्यम जो हर बच्चे को उसके सपनों तक पहुंचने में मदद करता है, खासकर जब वह सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आता हो। लेकिन कांकेर जिला मुख्यालय के पास स्थित

जेपी इंटरनेशनल स्कूल, सरंगपाल में शिक्षा सेवा कम और मुनाफा अधिक नजर आ रहा है।
यहां बच्चों के स्कूल में देर से पहुंचने पर ₹10 प्रतिदिन “लेट फीस” वसूली जा रही है, जिससे अभिभावकों में भारी आक्रोश है।

गरीबों के सपनों पर महंगी पेनल्टी

हर दिन की देरी का ₹10 जुर्माना—शायद सुनने में यह मामूली राशि लगे, लेकिन एक गरीब या मजदूर वर्ग के लिए यह हर दिन की दो वक्त की रोटी में सेंध है। जब एक किसान की पूरी दिनभर की मेहनत 200–300 रुपये तक सीमित हो, वहां से अगर हर महीने 100–200 रुपये “दंड” के नाम पर वसूले जाएं, तो यह शिक्षा का अपमान है।

बिना वैध नियम, अवैध वसूली

जानकारी के अनुसार, यह “लेट फीस” व्यवस्था न तो किसी आधिकारिक सरकारी नियम के तहत संचालित है और न ही इसकी कोई लिखित सूचना अभिभावकों को दी गई है। यानी स्कूल प्रबंधन द्वारा यह पूरी व्यवस्था मनमानी रूप से लागू की गई है। यह शिक्षा का व्यावसायीकरण ही नहीं, संवैधानिक अधिकारों का सीधा हनन भी है।

अभिभावकों का दर्द

एक दिहाड़ी मजदूर और छात्र के पिता बताते हैं
हम सुबह 5 बजे काम पर निकल जाते हैं, बच्चा अकेले आता है। कई बार बारिश, ट्रांसपोर्ट की दिक्कत या तबीयत ठीक न होने पर थोड़ा लेट हो जाता है। स्कूल वाले हर बार ₹10 काट लेते हैं। साल भर में यह ₹1000 से ऊपर चला जाता है। गरीब आदमी कहां से लाएगा ये पैसा?”

एक स्थानीय महिला बताती हैं—

हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं ताकि वे आगे बढ़ें, लेकिन इस तरह की फीस से डर लगता है कि कहीं स्कूल में पढ़ाना ही बंद न करना पड़े।

स्कूल का जवाब और शिक्षा विभाग की चुप्पी

स्कूल प्रशासन इस विषय पर कुछ भी कहने से बच रहा है। वहीं जब कुछ अभिभावकों ने लिखित शिकायत की, तो जवाब मिला—”ये स्कूल का नियम है, जिसे सबको मानना होगा।”
शिक्षा विभाग की ओर से अब तक कोई जांच या संज्ञान नहीं लिया गया है, जिससे लोगों में यह भी विश्वास टूटता जा रहा है कि कोई सुनवाई होगी।

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