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रायपुर,, सियासत दर्पण न्यूज़,देश-विदेश में चर्चित कथाकार, गद्यकार और पहल’ के यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन के निधन पर जन संस्कृति मंच, दुर्ग-भिलाई ने कथाकार कैलाश बनवासी के निवास पर आयोजित शोक सभा में उन्हें गहरी संवेदना के साथ याद करते हुए श्रद्धांजलि दी।
आलोचक सियाराम शर्मा ने कहा- “ज्ञानरंजन ने लेखकों को बनाने का काम किया। वह समय को बहुत पहले से देख लेने वाले वैश्विक दृष्टि से, वैचारिक प्रतिबद्धता से लैस विलक्षण कथाकार थे। उनके संपादन में निकले ‘पहल’ की भूमिका वही है, जो नवजागरण काल में महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में निकले ‘सरस्वती’ पत्रिका की थी। वे युवा रचनाकारों के प्रेरणा स्त्रोत थे। वह एक व्यक्ति नहीं, संस्था थे।
इस शोक सभा में संचालन करते हुए कथाकार कैलाश बनवासी ने ज्ञानरंजन के 90 वर्षों के अथक सक्रिय और कर्मठ जीवन का परिचय दिया। उन्होंने कहा- “वे अपने समय की चुनौतियों से लड़ने वाले प्रतिबद्ध योद्धा थे। वे प्रारंभ से ही विद्रोही तेवर के साठोत्तरी पीढ़ी के सबसे चर्चित कथाकार थे। उन्होंने अपनी पत्रिका ‘पहल’ को देश के हर कोने, भाषा से जोड़ा और कभी सत्तामुखी नहीं रहे।” साथ ही उन्होंने ज्ञानरंजन के समय को सूक्ष्मता से प्रकट करने वाले विलक्षण और महत्वपूर्ण गद्य का पाठ किया।
कवि घनश्याम त्रिपाठी ने उनकी कहानी ‘पिता’ की चर्चा करते हुए बेहद प्रभावशाली कहानी बताया।
‘पहल’ में छपी लंबी कविता ‘पुरातत्ववेत्ता’ के कवि शरद कोकास ने ज्ञानरंजन के साथ अपने बहुत लंबे समय से जुड़ाव को स्मरण करते हुए कहा कि वे सत्ता और राजनीति पर दो टूक बात करते थे और कविता के गहन पाठक थे।
युवा आलोचक अंजन कुमार ने उनकी कहानियों की संरचना, शिल्प, शैली और प्रभाव को विलक्षण बताते हुए कहा, वे अपने समय की संवेदनाओं के विघटन, क्षरण और बदलते मूल्यों को बहुत सूक्ष्मता से दर्ज करते थे। वे व्याप्त अंतर्विरोधों को काव्यात्मक गद्य में प्रकट करते थे।
कवयित्री और अनुवादक मिता दास ने उनसे अपनी मुलाकातों का जिक्र करते हुए उनकी साहसिकता और आत्मीयता को याद किया।
कथाकार विजय वर्तमान ने उनके अंतिम समय तक वैचारिक प्रतिबद्धता को दुर्लभ बताया।
श्रमिक नेता बृजेन्द्र तिवारी ने कहा कि उनके संपादन कार्य की व्यापकता आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।
सभा में श्रमिक नेता आर पी गजेन्द्र, दिनेश सोलंकी भी उपस्थित थे।







