*माओवादी ‘डॉक्टर’ का सनसनीखेज खुलासा: 300 लड़ाकों की नसबंदी, खौफनाक सच सामने*

जगदलपुर। (सियासत दर्पण न्यूज़) बस्तर के इन जंगलों के भीतर सक्रिय माओवादी बटालियन सिर्फ एक सैन्य इकाई नहीं, बल्कि एक ऐसी सुनियोजित ‘फैक्ट्री’ थी, जहां इंसान से उसकी संवेदनाएं छीनकर उसे हिंसक औजार में बदल दिया जाता था।

आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी ‘डाक्टर’ मड़कम केसा के खुलासे इस भयावह तंत्र की परत-दर-परत सच्चाई सामने लाते हैं। केसा के अनुसार, संगठन में कदम रखते ही युवाओं की दुनिया बदल दी जाती थी।
तैयारी का सबसे कठोर और निर्णायक हिस्सा नसबंदी था

पहले उनके हाथ में बंदूक थमाई जाती, फिर धीरे-धीरे यह एहसास मिटा दिया जाता कि उनका कोई अपना है। इस ‘तैयारी’ का सबसे कठोर और निर्णायक हिस्सा नसबंदी था। करीब 300 से अधिक माओवादियों की नसबंदी कर उन्हें परिवार, संतान और भविष्य के हर मोह से काट दिया गया। इनमें कई शादीशुदा भी थे, लेकिन उन्हें पिता बनने का अधिकार तक नहीं मिला।
वह जानता था कि कभी पिता नहीं बन सकेगा

खुद केसा भी इस प्रक्रिया से गुजरा। बाद में उसने संगठन की चेतना नाट्य मंडली की सदस्य आयती से विवाह किया। जंगल के भीतर, पारंपरिक भोज और रस्मों के बीच। लेकिन यह रिश्ता भी अधूरा था, क्योंकि वह जानता था कि वह कभी पिता नहीं बन सकेगा।

अब आत्मसमर्पण के बाद केसा और उसकी पत्नी आयती की सबसे बड़ी इच्छा सामान्य जीवन में लौटने की है। वे चाहते हैं कि उसकी नसबंदी को रिवर्स कराया जाए, ताकि वह अपने गांव में परिवार के साथ एक साधारण, मानवीय जीवन जी सके…वह जीवन, जो कभी उनसे छीन लिया गया था।
जंगल में सर्जरी, संवेदनाओं का अंत

केसा बताता है कि नसबंदी जैसी प्रक्रियाएं जंगलों में ही, अस्थायी ठिकानों पर और सीमित संसाधनों के बीच की जाती थीं। ‘डाक्टर’ की भूमिका निभाते हुए उसने खुद कई साथियों की नसबंदी की। यह सिर्फ एक चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी, जिसका उद्देश्य था लड़ाकों को उनके सबसे स्वाभाविक रिश्तों से काट देना। यही वजह रही कि इस बटालियन की क्रूरता कई बार रोंगटे खड़े कर देने वाली बनी।

ताड़मेटला में 76 जवानों की शहादत के बाद शवों के बीच जश्न मनाना हो या झीरम में महेंद्र कर्मा की हत्या के बाद हिंसक उत्सव। यह संवेदनहीनता की चरम अभिव्यक्ति थी।
नेतृत्व सुरक्षित, मोर्चे पर बस्तरिया चेहरे

बटालियन की रणनीति भी उतनी ही निर्मम थी। केसा के अनुसार, बड़े हमलों की योजना शीर्ष नेतृत्व बनाता था, लेकिन मुठभेड़ के समय वे सबसे पीछे रहते थे। केंद्रीय सैन्य प्रमुख थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी और राजनीतिक कमांडर नुने नरसिम्हा रेड्डी उर्फ सन्नू दादा उर्फ गोपन्ना शायद ही कभी सीधे मोर्चे पर दिखे।

कमांडर हिड़मा भी कड़े सुरक्षा घेरे में रहता था। अग्रिम पंक्ति में वे युवा होते थे, जिन्हें गांवों से लाकर ‘क्रांति’ का सपना दिखाया गया था। वही सबसे पहले गोलियों का सामना करते और सबसे ज्यादा हताहत होते। बटालियन का अनुशासन भय और अविश्वास पर टिका था।
हिड़मा के खौफ से सदस्य सीधे संवाद करने से बचते थे

हिड़मा को लेकर ऐसा खौफ था कि सदस्य उससे सीधे संवाद करने से बचते थे। वह अपने साथियों से दूरी बनाए रखता, यहां तक कि उनके साथ खाना भी नहीं खाता था। उसका भोजन उसके निजी गार्ड ही तैयार करते थे। सुकमा जिले के पूवर्ती गांव से आया हिड़मा कभी मवेशी चराने वाला युवक था, जिसे माओवादी अपने साथ ले गए और उसे संगठन के भीतर तैयार किया गया।

300 हथियारबंद माओवादियों वाली यह बटालियन रीढ़ थी

समय के साथ वह संगठन का सबसे कुख्यात कमांडर बन गया। सुरक्षा दबाव में टूटी बटालियन कभी 300 हथियारबंद माओवादियों वाली यह बटालियन संगठन की रीढ़ मानी जाती थी। 2019 तक इसका ठिकाना किस्टाराम के जंगल थे, लेकिन सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव ने इसे लगातार पीछे धकेला। एक के बाद एक कैंप खुलने और अभियानों के तेज होने के बाद 2023 में बटालियन को अपना गढ़ छोड़ना पड़ा।

जनवरी 2025 में कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों में डेरा डालने के बाद भी दबाव बना रहा और आखिरकार बटालियन कई हिस्सों में बंट गई। एक समूह हिड़मा के साथ, दूसरा देवजी के साथ। 18 नवंबर को आंध्रप्रदेश के मारेडुमिली के जंगल में हिड़मा मारा गया, जिसके बाद इस बटालियन का मनोबल टूटा और अब इसके सारे सदस्य समर्पण कर चुके हैं।

परिवार और अपनापन से अलग होते ही व्यक्ति की सहानुभूति खत्म होने लगती है। इसे ‘डी-ह्यूमनाइजेशन’ कहते हैं, जहां हिंसा सामान्य लगने लगती है। नसबंदी जैसी प्रक्रिया इस मानसिकता को स्थायी बना देती है और सामान्य जीवन में वापसी मुश्किल कर देती है। -डॉ. पवन बृज, मनोचिकित्सक

 

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