बिलासपुर।(सियासत दर्पण न्यूज़) नवंबर 2014 में जिले के पेंडारी और पेंड्रा में लगाए गए सरकारी नसबंदी शिविरों में नसबंदी के बाद महिलाओं की हालत बिगड़ गई थी। इससे 15 महिलाओं की मौत हो गई थी और 100 से अधिक महिलाओं को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था।
घटना के 11 साल 4 माह बाद जिला अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को दोषी ठहराया है। कोर्ट ने उन्हें दो साल की कैद और 25 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से परिवार नियोजन का लक्ष्य पूरा करने के दबाव के बीच डॉ. गुप्ता ने एक प्रशिक्षु के साथ महज तीन घंटे में 83 आपरेशन किए थे। एडीजे शैलेश कुमार ने यह निर्णय सुनाया। डॉ. आरके गुप्ता पर आईपीसी की धारा 304(ए) के तहत गैर-इरादतन हत्या का आरोप तय किया गया था।
अदालत ने उन्हें दो साल की कैद और 25 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। इसके साथ ही धारा 337 के तहत छह माह की सजा और 500 रुपये का जुर्माना तथा धारा 379 के तहत एक माह की सजा का भी आदेश दिया गया है।
सिप्रोसिन दवा में चूहामार दवा की मिलावट की गई थी
घटना के बाद मामला तूल पकड़ने पर पुलिस ने दवा सप्लाई के मामले में महावर फार्मा के संचालक रमेश महावर, सुमित महावर और कविता फार्मास्यूटिकल्स के राकेश खरे, राजेश खरे तथा मनीष खरे के खिलाफ भी कार्रवाई कर चालान कोर्ट में पेश किया था।
इन पर आरोप लगाया गया था कि सिप्रोसिन दवा में चूहामार दवा (जिंक फास्फाइड) की मिलावट की गई थी। हालांकि अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में इन सभी को बरी कर दिया।
घटना के बाद नसबंदी कांड की गूंज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सुनाई दी थी। इस मामले ने देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी चिंता पैदा कर दी थी। तत्कालीन समय में संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनएफपीए) की उपनिदेशक केट गिलमोर ने बयान जारी कर इस घटना को घोर मानवीय त्रासदी बताया था।
उन्होंने कहा था कि ऐसी घटनाएं स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर खामियों को उजागर करती हैं और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। इस घटना को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी काफी प्रतिक्रिया हुई थी।
तखतपुर ब्लॉक के पेंडारी स्थित नेमीचंद जैन कैंसर अस्पताल में नसबंदी शिविर का आयोजन किया गया था। सुबह 10 बजे से ही आसपास के करीब 40 गांवों की 83 महिलाओं को ऑपरेशन के लिए बुलाया गया था। ऑपरेशन के करीब दो घंटे बाद ही सभी महिलाओं को दवाएं देकर घर भेज दिया गया।
शाम होते-होते महिलाओं की तबीयत बिगड़ने लगी और उन्हें उल्टी, बुखार व तेज दर्द की शिकायत होने लगी। पेंड्रा के शिविर में भी इसी तरह की स्थिति सामने आई थी। हालत गंभीर होने पर कई महिलाओं को अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा।
सिम्स, जिला अस्पताल और अपोलो अस्पताल में 100 से अधिक महिलाओं को भर्ती किया गया था। इलाज के दौरान इनमें से 15 महिलाओं की मौत हो गई। इस सरकारी नसबंदी शिविर की त्रासदी में किसी परिवार ने अपनी मां खो दी तो किसी ने बेटी या बहू को।






