महासमुंद।(सियासत दर्पण न्यूज़) जिले में प्रशासन कैसे चल रहा है इसकी बानगी देखिए कि एक लिपिक खुद को व्याख्याता एलबी बना लेता है और आठ महीने से अधिक समय तक व्याख्याता का वेतन आहरण करता है, इधर इसकी भनक न आहरण संवितरण अधिकारी स्कूल के प्राचार्य को होती है और न ही बीइओ, डीइओ व जिला कोषालय अधिकारी को।
यह मामला जनवरी 2026 में रायपुर स्थित संचालनालय कोष एवं लेखा के सजग अधिकारी के संज्ञान में आता है। आनन-फानन में डीईओ नोटिस जारी करते हैं और निलंबित कर लिपिक को एफआईआर से बचा लेते हैं, ताकि खुद पर आंच न आये।
मामला शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सिरपुर में पदस्थ सहायक ग्रेड-02 कर्मचारी नारायण प्रसाद निर्मलकर का है। निर्मलकर स्कूल में सभी का वेतन बनाता था, इसे प्राचार्य उमा ठाकुर से डिजिटल साइन कराता था, बाद कोषालय से सभी का वेतन निकल जाता था।
डीईओ के पत्र के अनुसार निर्मलकर ने मई 2025 से दिसंबर 2025 तक अपने मूल वेतन से कई गुना अधिक खुद का वेतन बनाकर आहरण किया।
डीईओ के पत्र के अनुसार ऐसा कर उसने शासन को 13 लाख रुपये की क्षति पहुंचाई, जबकि उसके वेतन की हिस्ट्री की जांच की जाए तो यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।
मामला चूंकि वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में आया जिसके बाद डीईओ ने 27 जनवरी को निलंबित कर दिया। इस अवधि में निर्मलकर को बीइओ कार्यालय अटैच किया गया। किन्तु 25 मार्च तक निर्मलकर ने बीइओ कार्यालय में मौजूदगी नहीं दी।
जांच प्रतिवेदन और पदनाम में फर्जीवाड़ा
जिला कोषालय अधिकारी द्वारा प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन में यह सामने आया कि संबंधित कर्मचारी ने बिना आहरण संवितरण अधिकारी को जानकारी दिए अपने पदनाम में स्वयं परिवर्तन कर लिया।
उन्होंने सहायक ग्रेड-02 (लेवल-06) से व्याख्याता एल.बी. (लेवल-09) के रूप में दर्शाते हुए वेतन निर्धारण में भी वृद्धि कर ली। इसके चलते मई 2025 से दिसंबर 2025 के बीच लगभग 13 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि का अनाधिकृत आहरण किया गया।
जांच में प्रथम दृष्टया यह कृत्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम-3 का उल्लंघन पाया गया है। इसी के तहत छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के नियम-9 के अंतर्गत निर्मलकर को निलंबित किया गया है।
अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
लिपिक निर्मलकर द्वारा शासन से की गई आर्थिक धोखाधड़ी के अपराध में प्राचार्य उमा ठाकुर से लेकर बीइओ, डीईओ व जिला कोषालय अधिकारी तक की जिम्मेदारी परिलक्षित होती है, क्योंकि केवल एक या दो माह की बात नहीं बल्कि आठ माह से क्रम जारी था।
लिपिक ने वेतन बनाया, प्राचार्य से हस्ताक्षर कराया, तब प्राचार्य ने अचानक बढ़े वेतन को क्यों नहीं पकड़ा, फिर पेमेंट के लिए जिला कोषालय अधिकारी के पास वेतन पत्रक गया, तब उसने क्यों नहीं देखा, हर माह वेतन पत्रक का मासिक प्रतिवेदन ब्लाक शिक्षा अधिकारी व जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में ऑनलाइन रिकार्ड की कापी लगाकर दिया जाता रहा, इसे जांचा क्यों नहीं गया।
प्राथमिकी दर्ज न होने पर संदेह
पूरे मामले में यह प्रतीत होता है कि डीईओ की खामियों को छिपाने के लिए आर्थिक अनियमितता के अपराध में प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई गई। जबकि यह आपराधिक कृत्य है।
विभिन्न पक्षों के कथन
नारायण प्रसाद निर्मलकर (निलंबित लिपिक) – “मामले में मैं निलंबित हूँ। मैंने 19 मार्च को शासन का पूरा पैसा लौटा दिया है। अब अपराध खत्म हो गया है। अधिकारियों को इससे अवगत करा दिया है। उनका आश्वासन है अब कुछ नहीं होगा।”
लीलाधर सिन्हा (बीइओ महासमुंद) – “27 जनवरी से नारायण प्रसाद निर्मलकर निलंबित है। उसे बीइओ कार्यालय में हाजिरी देना है, आजतक उसने उपस्थिति नहीं दी है।”
विजय कुमार लहरे (डीईओ महासमुंद) – “आठ माह से अधिक वेतन हमारी पकड़ में नहीं आया, किन्तु यह हमारी चूक नहीं है, यह संबंधित कर्मचारी का ही आपराधिक व्यवहार है। मामले में पैसे जमा कराए हैं। अब डीई शुरू की गई है। एफआईआर नहीं कराए हैं।”
संजय चौधरी (जिला कोषालय अधिकारी) – “मैं अभी व्यस्त हूँ, बाद में बात करूंगा।”
विनय कुमार लंगेह (कलेक्टर महासमुंद) – “निःसन्देह यह आपराधिक मामला है, इसमें एफआईआर दर्ज कराएंगे।”







