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*मोहला में आदिवासी बच्चों की पढ़ाई ठप, गुस्साए ग्रामीणों ने स्कूल में जड़ा ताला*

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मोहला। (सियासत दर्पण न्यूज़) मोहला-मानपुर जिले के मोहला विकासखंड अंतर्गत ग्राम मचान्दूर स्थित पूर्व माध्यमिक शाला में आदिवासी बच्चों की शिक्षा के साथ हो रहे कथित खिलवाड़ के विरोध में बुधवार को ग्रामीणों का सब्र टूट गया। जून माह से विद्यालय में पढ़ाई ठप रहने से आक्रोशित पालकों ने स्कूल में तालाबंदी कर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया।

ग्रामीणों का आरोप है कि स्कूल में पदस्थ महिला शिक्षिका आशा धृतलहरें शिक्षा विभाग के कथित संरक्षण में मेडिकल अवकाश के नाम पर फिट-अनफिट का खेल खेल रही हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो रही है। एक दिन ज्वाइनिंग, फिर महीनों छुट्टीग्रामीणों के अनुसार युक्ति, युक्तिकरण के तहत 16 जून 2025 को ज्वाइनिंग देने के बाद शिक्षिका ने नियमित रूप से विद्यालय में पढ़ाई नहीं कराई।

आरोप है कि वह तीन-तीन महीने का मेडिकल अवकाश लेती रहीं। ज्वाइनिंग के लिए केवल एक दिन स्वयं को फिट बताकर कार्यालय पहुंचती हैं और अगले ही दिन फिर मेडिकल छुट्टी लेकर विद्यालय से नदारत हो जाती हैं। हालात ऐसे बन गए कि ग्रामीणों को हर घर से 100 रुपये चंदा कर गांव से ही एक शिक्षक की व्यवस्था करनी पड़ी, ताकि बच्चों की पढ़ाई किसी तरह चल सके।

छात्र बोले- तीन बार आईं, एक भी कक्षा नहीं लीविद्यालय की आठवीं कक्षा के छात्र गोपेश कुमार ने बताया कि अब तक मैडम केवल तीन बार स्कूल आई हैं और किसी भी कक्षा का संचालन नहीं किया गया। दस्तावेजों के अनुसार शिक्षिका 1 अक्टूबर 2025 से 12 जनवरी 2026 तक मेडिकल अवकाश पर रहीं। 13 जनवरी को एक दिन के लिए जॉइनिंग दी और अगले ही दिन पुनः मेडिकल छुट्टी लेकर विद्यालय नहीं पहुंचीं।

बुधवार सुबह से बड़ी संख्या में ग्रामीण स्कूल गेट पर धरने पर बैठे रहे। घंटों चले प्रदर्शन के बाद दोपहर में जिला शिक्षा अधिकारी योग दास साहू मौके पर पहुंचे और ग्रामीणों से चर्चा की। उन्होंने वैकल्पिक व्यवस्था के तहत ककईपार से एक शिक्षक की नियुक्ति का आश्वासन दिया। इसके बाद स्कूल का ताला खोला गया।

जिला शिक्षा अधिकारी ने मेडिकल फिट-अनफिट के मामले में जेडी कार्यालय से पत्राचार कर जांच और कार्रवाई की अनुशंसा करने की बात कही।मेडिकल अवकाश स्वीकृत नहीं, वेतन भी नहींइधर मोहला विकासखंड शिक्षा अधिकारी राजेंद्र देवांगन ने स्पष्ट किया कि मेडिकल बोर्ड का प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण विभाग ने कोई मेडिकल अवकाश स्वीकृत नहीं किया है। न ही अब तक कोई मासिक वेतन जारी किया गया है।

नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है और पूरे मामले की जांच की जा रही है। सबसे बड़ा सवाल, जांच में देरी क्यों? इस पूरे मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। शिक्षिका लगातार स्कूल से अनुपस्थित रही और इस मामले की किसी को भनक तक नहीं लगी।

हर तीन महीने में उनके मेडिकल सर्टीफिकेट पर कोई जांच या संज्ञान न लिया जाना अधिकारी कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध बनाती है। कुल मिलाकर विभागीय संरक्षण के चलते ही शिक्षिका के हौसले बुलंद रहे।

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