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*छत्तीसगढ़ के 17 जिलों में मतांतरण को लेकर तनावपूर्ण स्थिति*

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रायपुर। (सियासत दर्पण न्यूज़) मतांतरण का मुद्दा अब एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है। छत्तीसगढ़ के 33 में से 17 जिलों में मतांतरण को लेकर स्थितियां तनावपूर्ण हैं। पिछले एक साल में राज्यभर में मतांतरण के 96 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें सर्वाधिक 32 मामले अकेले बिलासपुर जिले के हैं।

बिगड़ते हालातों और बढ़ते सामाजिक टकराव को देखते हुए विष्णु देव साय सरकार इसी बजट सत्र में मतांतरण विरोधी कानून का नया विधेयक लाने जा रही है, जिसके मसौदे को मंजूरी दे दी गई है।
60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित सूचना देनी होगी

यह बिल (छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्रय विधेयक, 2026) इसी बजट सत्र में विधानसभा में पेश किया जा सकता है। यदि यह कानून लागू होता है, तो स्वैच्छिक मतांतरण करने वाले व्यक्तियों को कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित सूचना देनी होगी।
10 साल तक की जेल और भारी जुर्माने का प्रविधान

प्रलोभन, छल-कपट या धोखाधड़ी से कराए गए मतांतरण पर 10 साल तक की जेल और भारी जुर्माने का प्रविधान है। सामूहिक मतांतरण के मामले में सजा और भी कठोर होगी। मतांतरण के 60 दिनों के भीतर एक घोषणा पत्र भरना अनिवार्य होगा और प्रशासन इसकी जांच करेगा कि यह स्वेच्छा से हुआ है या नहीं। न्यायालय पीड़ित को पांच लाख रुपये तक का मुआवजा दिलाने का आदेश दे सकता है।
लगातार टकराव की स्थिति

राज्य में वर्ष 2021 से जुलाई 2025 के बीच हिंदू और ईसाई समाज के बीच 102 बार टकराव की स्थिति निर्मित हुई। इस दौरान कुल 44 एफआइआर दर्ज की गई, जिनमें से 23 मामले मौजूदा साय सरकार के कार्यकाल में दर्ज हुए हैं। अभी मतांतरित लोगों के दाह संस्कार से भी जुड़ी शिकायतें हैं भी आ रही हैं।

33 जिलों में से आधे से अधिक 17 जिलों में मतांतरण और उससे जुड़े विवाद सामने आए हैं। जिन जिलों में प्रकरण दर्ज हुए हैं उनमें-राजनांदगांव, रायपुर, दुर्ग, कांकेर, बलरामपुर, बिलासपुर, नारायणपुर, जीपीएम, सरगुजा, सूरजपुर, जांजगीर-चांपा, मुंगेली, बालोद, धमतरी, कबीरधाम और जशपुर जिला है।
बिलासपुर-धमतरी हॉट स्पाट बने एक साल के भीतर

बिलासपुर में सर्वाधिक 32 प्रकरण दर्ज किए गए हैं। इसके बाद धमतरी में 29, रायपुर और बलरामपुर-रामानुजगंज में 9-9 शिकायतें आई है। इसके अलावा कांकेर में 5, जांजगीर-चांपा में 8, मुंगेली में 4, बालोद में 3, राजनांदगांव में 2, गरियाबंद में 2, जशपुर में 2, नारायणपुर में 3, और धमतरी में 2 प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

यहां केवल जीवित रहते ही नहीं, बल्कि मतांतरित लोगों के निधन के बाद उनके दाह संस्कार को लेकर भी ग्रामीण क्षेत्रों में भारी विवाद की स्थिति भी देखने को मिल रही है। बस्तर से लेकर सरगुजा तक सामाजिक बहिष्कार और अंतिम संस्कार को लेकर टकराव की दर्जनों शिकायतें प्रशासन के पास लंबित हैं।
हाई कोर्ट की टिप्पणी

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भी जनजातीय क्षेत्रों में प्रलोभन के जरिए हो रहे मतांतरण को ‘सामाजिक खतरा’ करार दिया है।
हालिया प्रमुख घटनाएं जिसने बढ़ाई सरगर्मी

राजनांदगांव (जनवरी 2026): अवैध आश्रम की आड़ में नाबालिगों के मतांतरण नेटवर्क का भंडाफोड़। बिलासपुर (फरवरी 2026): झाड़-फूंक के नाम पर मतांतरण की कोशिश, हिंदू संगठनों की दबिश के बाद पादरी फरार।

रायपुर (जनवरी 2025): पंडरी के मितान विहार में ‘चंगाई सभा’ के दौरान हंगामा; पादरी कीर्ति केशरवानी समेत

तीन पर एफआइआर। दुर्ग (जुलाई 2025): रेलवे स्टेशन से दो मिशनरी नन गिरफ्तार। हालांकि, बाद में पीड़ितों ने दबाव में बयान देने की बात कही।

कांकेर (दिसंबर 2025): आमाबेड़ा हिंसा के विरोध में छत्तीसगढ़ बंद का व्यापक असर देखा गया।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान भी मतांतरण के मामले सामने आए थे, लेकिन तब कार्रवाई की रफ्तार धीमी थी। इसके विपरीत, वर्तमान विष्णु देव साय सरकार ऐसे मामलों में त्वरित पुलिस कार्रवाई और एफआइआर को प्राथमिकता दे रही है, जिसे नए कानून के जरिए और अधिक सख्त बनाने की तैयारी है।

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