*पूर्व IAS टुटेजा से जुड़े व्यवसायी की जमानत खारिज, हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी*

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बिलासपुर: (सियासत दर्पण न्यूज़) डीएमएफ घोटाले के आरोपित व कमीशन एजेंट की भूमिका निभाने वाले व्यवसायी सतपाल सिंह छाबड़ा की स्थायी जमानत याचिका को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि आर्थिक अपराध जानबूझकर व्यक्तिगत फायदे के लिए किया जाता है, इसका सबसे ज्यादा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि डीएमएफ घोटाले की राज्य की जांच एजेंसियों के द्वारा जांच की जा रही है, लिहाजा याचिकाकर्ता की कस्टडी ज़रूरी है।

रायपुर निवासी सतपाल सिह छाबड़ा को एसीबी एवं ईओडब्ल्यू ने डीएमएफ का सुनियोजित तरीके से घोटाला करने एवं मनिलाड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया है। सतपाल सिंह ने हाई कोर्ट में नियमित जमानत के लिए याचिका दायर की थी। ईओडब्ल्यू के अनुसार उसने खरीदी और आपूर्ति से जुड़ी गड़बड़ियों में एक मुख्य बिचौलिया और कमीशन एजेंट के तौर पर काम किया है।

याचिकाकर्ता सतपाल सिह छाबड़ा ने डीएमएफ से जुड़ी कृषि संबंधी योजनाओं के तहत खरीद और आपूर्ति से संबंधित कथित अनियमितताओं में एक प्रमुख मध्यस्थ और कमीशन एजेंट के रूप में कार्य किया है। जांच के दौरान छाबड़ा ने स्वीकार किया है, 2019 से वह कृषि विभाग में आपूर्ति कार्यों को सुविधाजनक बनाने में सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं, उससे मंदीप चावला उर्फ मैडी ने संपर्क किया था, जिसने पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा के प्रभाव से विभागीय काम हासिल करने का प्रस्ताव दिया था।

विक्रेताओं से लिया 30-35 प्रतिशत कमीशन

याचिकाकर्ता पर आरोप है, उसने रेट कान्ट्रैक्ट विक्रेताओं को कृषि और बागवानी जैसे विभागों से जोड़ने वाले एजेंट के रूप में काम किया। कमीशन के बदले आपूर्ति आदेशों को सुविधाजनक बनाया। विक्रेताओं से 30 प्रतिशत से 35 प्रतिशत कमीशन लिया गया। 10 प्रतिशत ऊपर की ओर भेजा गया और बाकी 20 प्रतिशत से 25 प्रतिशत सतपाल सिह छाबड़ा और मंदीप चावला के बीच बंटा हुआ था। हालांकि रेट कांट्रैक्ट टेंडर प्रक्रिया के तहत दिया था, लेकिन काम का बंटवारा एजेंटों के जरिए किया गया था। वेंडर्स को भी कमीशन देने के लिए मजबूर किया गया था। कमीशन देने के एवज में ही काम दिया जा रहा था।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, आर्थिक अपराध जानबूझकर व्यक्तिगत फायदे के लिए किया जाता है, चाहे समाज पर इसका कोई भी बुरा असर हो। देश की अर्थव्यवस्था व देशहित को नुकसान होता है। लिहाजा जमानत को अलग नजरिए से देखने की जरुरत नहीं है।

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