रायपुर। (सियासत दर्पण न्यूज़) छत्तीसगढ़ के दूरस्थ गांवों में हजारों बुजुर्गों की आंखों की रोशनी दांव पर लगी है, तो इसकी वजह सिर्फ मरीजों का अस्पताल न पहुंचना नहीं है। असल गुनाहगार सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का वह दमघोंटू और पुराना ढांचा है, जो दशकों से बदला ही नहीं गया। भास्कर की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि राज्य का पूरा सरकारी आई-केयर सेटअप साल 2000 की क्षमता पर रेंग रहा है।
26 सालों में मरीजों की तादाद तो कई गुना बढ़ गई, लेकिन अस्पतालों में संसाधन जस के तस हैं। ऊपर से नियम ऐसे कि एक सर्जन हफ्ते में औसतन सिर्फ 20 सर्जरी ही कर पा रहा है। इसी का नतीजा है कि गरीब मरीज सालों से ऑपरेशन के इंतजार में अंधे होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
राज्य में करीब 100 नेत्र सर्जन हैं जो मोतियाबिंद ऑपरेशन कर सकते हैं। इनमें से 33 जिला अस्पतालों में एक-एक नेत्र सर्जन का पद स्वीकृत है। इसके अलावा मेडिकल कॉलेजों और अन्य अस्पतालों में भी नेत्र विशेषज्ञ पदस्थ हैं।
एक ओर डाक्टरों की कमी दूसरी ओर जिला अस्पतालों में मोतियाबिंद मरीजों के लिए औसतन केवल 10-10 बेड आरक्षित रहते है। सरकारी मानकों के अनुसार एक नेत्र सर्जन एक दिन में अधिकतम 20 मोतियाबिंद सर्जरी कर सकता है। लेकिन व्यवहारिक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है।
मरीज को जांच, सर्जरी और फॉलोअप प्रक्रिया सहित न्यूनतम तीन से चार दिन भर्ती रखने का नियम है। ऐसे में यदि किसी जिला अस्पताल में केवल 10 बेड हैं तो एक साथ सीमित मरीज ही भर्ती किए जा सकते हैं।
यही वजह है कि कागजों में 20 सर्जरी प्रतिदिन की क्षमता दिखाई देती है, लेकिन जमीन पर बेड उपलब्धता सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। मरीजों की छुट्टी होने के बाद ही नए मरीजों का पंजीयन, जांच और ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू होती है। इससे जिला अस्पतालों में सर्जरी की वास्तविक क्षमता काफी कम हो जाती है।
केवल 2 हजार का अंशदान, इसलिए शहरों में फोकस
सामाजिक संस्थाओं को मरीजों को प्रेरित कर अस्पताल तक लाने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन उनके संसाधन भी सीमित हैं। एक सर्जरी पर लगभग दो हजार रुपए की सहायता मिलने के कारण अधिकांश संस्थाएं शहर और आसपास के क्षेत्रों में ही सक्रिय रहती हैं। दूरस्थ ग्रामीण इलाकों तक पहुंचना उनके लिए आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है। यही कारण है कि ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में मरीजों की पहचान और अस्पताल तक पहुंच दोनों प्रभावित हो रही हैं।
बालोद कांड के बाद लगी नेत्र शिविरों पर रोक, सर्जरी पर बैन भी
बालोद में करीब 10 साल पहले नेत्र शिविर के दौरान दो दर्जन से अधिक मरीजों की आंखों में इंफेक्शन हो गया था। उनकी मोतियाबिंद की सर्जरी करवाने वालों की आंखों की रौशनी चली गई थी। उसके बाद सार्वजनिक तौर पर होने वाले नेत्र शिविरों पर बैन लगा दिया गया। ये मापदंड भी तय किए गए कि एक शिफ्ट यानी एक दिन में कोई भी सर्जन 20 से ज्यादा सर्जरी नहीं कर सकेंगे।
सरकारी डॉक्टरों के पास जिम्मेदारी ज्यादा इसलिए बड़ी संख्या में सर्जरी करना संभव नहीं
पड़ताल में यह भी सामने आया कि जिला अस्पतालों में एकमात्र नेत्र सर्जन को ओपीडी, जांच और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ती हैं। ऐसे में नियमित रूप से बड़े पैमाने पर सर्जरी करना संभव नहीं हो पाता। कई अस्पतालों में स्थिति ऐसी है कि सर्जरी के लिए सप्ताह में सीमित दिन ही उपलब्ध हो पाते हैं।
इस बीच सरकार ने अब तक आयुष्मान योजना के तहत निजी अस्पतालों में मुफ्त मोतियाबिंद सर्जरी की व्यवस्था शुरू नहीं की है। इसका सीधा असर गरीब और ग्रामीण मरीजों पर पड़ रहा है। जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे निजी अस्पतालों में खर्च उठाकर सर्जरी करवा लेते हैं, लेकिन कमजोर वर्ग पूरी तरह सरकारी व्यवस्था पर निर्भर है।
एक्सपर्ट व्यू – डॉ. सुभाष मिश्रा, नेत्र विशेषज्ञ और रिटायर्ड राज्य महामारी नियंत्रण प्रभारी
ज्यादा देर होने से फूट सकता है मोतियाबिंद
मोतियाबिंद की सर्जरी में देरी नहीं करनी चाहिए। आंखों में सफेद धब्बे दिखाई देने का मतलब है मोतियाबिंद पक चुका है। इसके फूटने के 50 प्रतिशत चांस रहते हैं। इसलिए कभी इंतजार नहीं करना चाहिए कि मोतियाबिंद पकने पर ऑपरेशन करेंगे।
मोतियाबिंद फूटने पर आंखों की रौशनी जा सकती है। मोतियाबिंद फूटने के पहले आंखें लाल होने के साथ उसमें पानी आने लगता है। फिर एकाएक दिखाई कम देने लगता है। इस स्थिति में तुरंत सतर्क होना चाहिए। सही समय पर उपचार मिलने से बीमारी का बेहतर इलाज संभव हो पाता है। इसका हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
