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*आरंग की सीमाओं और आरक्षण पर सवाल*

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आरंग।(सियासत दर्पण न्यूज़) छत्तीसगढ़ का आरंग विधानसभा क्षेत्र अपनी भौगोलिक संरचना, प्रशासनिक सीमाओं और लंबे राजनीतिक इतिहास के कारण प्रदेश के अन्य विधानसभा क्षेत्रों से अलग पहचान रखता है। दो लाख से अधिक आबादी वाले इस विधानसभा क्षेत्र में आरंग शहर जहां क्षेत्रीय मुख्यालय और प्रमुख व्यापारिक केंद्र है, वहीं आसपास के अनेक गांव प्रशासनिक, थाना, विकासखंड, विधानसभा और व्यावसायिक संपर्क की अलग-अलग व्यवस्थाओं से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि आरंग विधानसभा क्षेत्र को लेकर एक बार फिर नए परिसीमन, सीमाओं के तार्किक पुनर्गठन और विधानसभा सीट को सामान्य किए जाने की मांग चर्चा में है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि आरंग शहर और ग्रामीण अंचल में जिस स्तर का समग्र, संतुलित और रोजगारपरक विकास होना चाहिए था, वह अपेक्षित गति से नहीं हो सका। इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन क्षेत्र की मौजूदा भौगोलिक एवं प्रशासनिक संरचना भी विकास की योजना और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती है।

आरंग की विकास यात्रा में जनसंख्या का उतार-चढ़ाव भी महत्वपूर्ण अध्याय

आरंग शहर के विकास की चर्चा जनसंख्या के आंकड़ों के बिना अधूरी मानी जाती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1971 में आरंग शहर की जनसंख्या 13,345 थी, जो वर्ष 1981 में घटकर 10,207 रह गई। एक दशक में आबादी में आई यह कमी आरंग के शहरी विकास की गति को लेकर कई सवाल खड़े करती है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि किसी शहर की आबादी केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं होती, बल्कि वह उसकी आर्थिक गतिविधियों, रोजगार, व्यापार, आवासीय विस्तार और बुनियादी सुविधाओं का भी संकेत देती है। आरंग में एक दौर में जनसंख्या वृद्धि की गति प्रभावित होने से व्यापारिक और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा। स्थानीय स्तर पर इसे आरंग के विकास की रफ्तार धीमी पड़ने के प्रमुख संकेतों में गिना जाता है।

हालांकि, जनसंख्या में कमी को केवल विकास की कमी से जोड़ना उचित नहीं होगा। जनगणना की सीमाओं, प्रशासनिक वर्गीकरण और अन्य जनसांख्यिकीय कारणों का भी इसमें योगदान हो सकता है। फिर भी यह आंकड़ा आरंग के शहरी विकास पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता जरूर पैदा करता है।
एक गांव का थाना आरंग, विधानसभा अभनपुर और व्यापारिक संपर्क नवापारा-राजिम से आरंग विधानसभा क्षेत्र की भौगोलिक एवं प्रशासनिक संरचना की सबसे अधिक चर्चा उन गांवों को लेकर होती है, जिनका प्रशासनिक जुड़ाव आरंग से है, लेकिन विधानसभा क्षेत्र अलग है।
आरंग से निकट स्थित तमासिवनी इसका एक उदाहरण है। स्थानीय जानकारी के अनुसार तमासिवनी का थाना आरंग है, लेकिन उसका विधानसभा क्षेत्र अभनपुर है। वहीं उसके व्यापारिक एवं आर्थिक संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र नवापारा-राजिम की ओर है।
इसी प्रकार आरंग शहर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित पंधी गांव का थाना और विकासखंड आरंग से जुड़ा हुआ है, लेकिन विधानसभा की दृष्टि से वह अभनपुर क्षेत्र में आता है।
इस स्थिति को स्थानीय लोग इस रूप में देखते हैं कि प्रशासनिक व्यवस्था एक जगह, राजनीतिक प्रतिनिधित्व दूसरी जगह और व्यापारिक संपर्क तीसरी दिशा में है। उनका मानना है कि ऐसी संरचना में क्षेत्र के लिए एकीकृत विकास की दीर्घकालिक योजना तैयार करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

चार दिशाओं में असमान विस्तार भी बना चर्चा का विषय

आरंग विधानसभा क्षेत्र की सीमाओं को लेकर स्थानीय स्तर पर एक और महत्वपूर्ण सवाल इसकी भौगोलिक असमानता को लेकर उठता है। क्षेत्रीय तौर पर बताए जाने वाले आंकड़ों के अनुसार पूर्व दिशा में विधानसभा सीमा लगभग 5 किलोमीटर, दक्षिण दिशा में करीब 2 किलोमीटर, पश्चिम दिशा में लगभग 23 किलोमीटर और उत्तर दिशा में करीब 32 किलोमीटर तक बताई जाती है।

सीमाओं का यह असमान स्वरूप आरंग विधानसभा की भौगोलिक संरचना को विशिष्ट बनाता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि भविष्य में जब भी परिसीमन की प्रक्रिया हो, तो केवल जनसंख्या के आंकड़ों के बजाय भौगोलिक निरंतरता, प्रशासनिक सुविधा, आवागमन, बाजार व्यवस्था, सामाजिक संपर्क और विकास की संभावनाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

1962 से आरक्षित सीट, सामान्य क्षेत्र की मांग फिर मुखर

आरंग विधानसभा क्षेत्र वर्ष 1962 से आरक्षित रहा है और वर्तमान में भी यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है। इसी पृष्ठभूमि में लंबे समय से आरंग को सामान्य विधानसभा क्षेत्र बनाए जाने की मांग क्षेत्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही है।
मांग करने वाले लोगों का तर्क है कि लंबे समय तक आरक्षित रहने के बाद अब क्षेत्र की वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों का नए सिरे से अध्ययन किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि भविष्य में परिसीमन होता है तो आरंग को उसकी मौजूदा जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक संरचना के अनुरूप पुनर्विचार के दायरे में लाया जाना चाहिए।

हालांकि, विधानसभा सीट का आरक्षण किसी दल या स्थानीय राजनीतिक निर्णय से सीधे निर्धारित नहीं होता। यह संविधान और परिसीमन से संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत तय होता है। इसलिए आरंग को सामान्य सीट बनाने की मांग का अंतिम निर्णय भी निर्धारित परिसीमन प्रक्रिया के तहत ही संभव होगा।

1977 और 2003 के परिसीमन की चर्चाएं फिर आईं सामने

आरंग को सामान्य विधानसभा क्षेत्र बनाए जाने की चर्चा नई नहीं है। स्थानीय राजनीतिक विमर्श में वर्ष 1977 और 2003 के परिसीमन के दौर का उल्लेख करते हुए यह दावा किया जाता रहा है कि उस समय आरंग के सामान्य विधानसभा क्षेत्र बनने की संभावनाओं पर चर्चा हुई थी।
हालांकि, इन अवधियों में आरंग को सामान्य सीट बनाने संबंधी दावों की पुष्टि के लिए संबंधित परिसीमन आदेशों और आधिकारिक दस्तावेजों का अध्ययन आवश्यक है। इसलिए इसे स्थानीय स्तर पर चली आ रही राजनीतिक चर्चा और मांग के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
फिर भी यह मुद्दा बताता है कि आरंग में विधानसभा क्षेत्र की संरचना को लेकर बहस कई दशकों से समय-समय पर सामने आती रही है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विकास की दिशा पर बहस

आरंग की राजनीति में लंबे समय से यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या मौजूदा राजनीतिक एवं प्रशासनिक संरचना क्षेत्र की विकास आवश्यकताओं के अनुरूप है। स्थानीय नागरिकों का एक वर्ग मानता है कि आरंग शहर और ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं को एक साथ रखकर दीर्घकालीन विकास एजेंडा तैयार किए जाने की आवश्यकता है।
वहीं अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को उनके समर्थक अपने-अपने तरीके से रेखांकित करते रहे हैं। स्थानीय राजनीतिक चर्चा में भाजपा के नवीन मार्कण्डेय और कांग्रेस के डॉ. शिवकुमार डहरिया के कार्यकाल को भी विकास के अलग-अलग चरणों के रूप में देखा जाता है।
इससे स्पष्ट है कि आरंग में बहस केवल प्रतिनिधि कौन रहा, इस सवाल तक सीमित नहीं है, बल्कि अब चर्चा इस बात पर केंद्रित हो रही है कि आरंग को किस तरह की राजनीतिक और प्रशासनिक संरचना चाहिए, जिससे विकास का लाभ शहर और गांव दोनों तक समान रूप से पहुंच सके।

शासकीय भूमि के अभाव से उद्योगों की राह हुई कठिन

आरंग के विकास की सबसे बड़ी चुनौतियों में औद्योगिक विस्तार का अभाव भी शामिल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्याप्त शासकीय भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण बड़े उद्योगों और औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना की संभावनाएं सीमित रही हैं।
उद्योगों की कमी का असर रोजगार के अवसरों पर भी पड़ता है। स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए रायपुर और अन्य औद्योगिक शहरों की ओर जाना पड़ता है। यदि आरंग में व्यवस्थित औद्योगिक क्षेत्र, पर्याप्त भूमि और आधारभूत सुविधाएं विकसित हों तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के साथ-साथ व्यापार, परिवहन, आवास और सेवा क्षेत्र को भी गति मिल सकती है।
इसलिए आरंग के विकास का प्रश्न केवल विधानसभा सीमा या आरक्षण तक सीमित नहीं है। इसमें उद्योग, रोजगार, शहरी विस्तार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दे भी समान रूप से जुड़े हुए हैं।

आरंग शहर के विकास को चाहिए दीर्घकालीन विजन

आरंग को यदि वास्तविक अर्थों में क्षेत्रीय विकास केंद्र बनाना है तो शहर के लिए दीर्घकालीन शहरी विकास योजना की आवश्यकता महसूस की जा रही है। बढ़ती आबादी, यातायात, बाजार, आवास, जल निकासी, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे विषयों को एक साथ लेकर योजना बनाना जरूरी होगा।
इसके साथ ग्रामीण क्षेत्र को भी आरंग शहर से जोड़ते हुए ऐसी विकास व्यवस्था की जरूरत है जिसमें गांवों को केवल प्रशासनिक इकाई नहीं बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के सक्रिय भागीदार के रूप में देखा जाए।
आरंग के आसपास के गांवों के बाजार, कृषि उत्पादन, परिवहन और रोजगार को शहर से जोड़कर एक मजबूत ग्रामीण-शहरी आर्थिक गलियारा तैयार किया जा सकता है। इससे आरंग की व्यापारिक भूमिका भी मजबूत हो सकती है।

सामान्य सीट की मांग के साथ उठ रहा व्यापक पुनर्संरचना का सवाल

आरंग को सामान्य विधानसभा क्षेत्र बनाए जाने की मांग को केवल आरक्षण के प्रश्न तक सीमित करना इस बहस को छोटा कर देगा। इसके साथ क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं, प्रशासनिक इकाइयों, ग्रामीण-शहरी संपर्क, औद्योगिक संभावनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि भविष्य के किसी भी परिसीमन में आरंग की वास्तविक परिस्थितियों का समग्र अध्ययन किया जाना चाहिए। जनसंख्या के साथ भौगोलिक निरंतरता, प्रशासनिक सुविधा, सामाजिक संपर्क, आवागमन और आर्थिक गतिविधियों को भी आधार बनाया जाना चाहिए।

अब आरंग पूछ रहा है- क्या अगला परिसीमन बदलेगा तस्वीर?

आरंग विधानसभा क्षेत्र की वर्तमान स्थिति कई महत्वपूर्ण सवालों को जन्म देती है। क्या विधानसभा की वर्तमान सीमाएं क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप हैं? क्या आरंग शहर को वह विकास मिला जिसकी राजधानी क्षेत्र से निकटता को देखते हुए अपेक्षा की जाती है? क्या उद्योग और रोजगार के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचा विकसित हो पाया है? और सबसे महत्वपूर्ण- क्या भविष्य के परिसीमन में आरंग की भौगोलिक एवं प्रशासनिक विसंगतियों पर विचार किया जाएगा?
इन सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तथ्यों, जनसंख्या आंकड़ों, प्रशासनिक सीमाओं, विकास योजनाओं और परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर तलाशना होगा।
आरंग को सामान्य विधानसभा क्षेत्र बनाए जाने की मांग इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा बनकर एक बार फिर सामने आई है। आने वाले समय में यदि परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होती है तो आरंग के नागरिकों की नजर इस बात पर रहेगी कि उनके क्षेत्र की भौगोलिक वास्तविकता, प्रशासनिक सुविधा, सामाजिक संरचना और विकास की आकांक्षाओं को कितना महत्व मिलता है।
आरंग के लिए मुद्दा सिर्फ आरक्षित से सामान्य सीट बनने का नहीं है। असली सवाल है- आरंग की राजनीतिक पहचान, प्रशासनिक संरचना और विकास की दिशा क्या होगी? यही सवाल अब क्षेत्र के भविष्य के नए राजनीतिक क्षितिज की आधारभूमि बनता दिखाई दे रहा है।

 

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