रायपुर,,सियासत दर्पण न्यूज़,,एक आदमी ने दो साल पहले अपने बेटे को दफ़नाया था। बेटा युद्ध में मरा था। कल उसी आदमी को उसके देश के एक सौ बीस में से सड़सठ सांसदों ने प्रधानमंत्री के लिए सिफ़ारिश कर दी। युद्ध उसने नहीं शुरू किया था। शांति उसे बनानी होगी।
दृश्य एक। यरुशलम, राष्ट्रपति भवन का बरामदा। छह पार्टियों के लोग बारी-बारी भीतर जाते हैं और एक ही नाम लेकर बाहर आते हैं, गादी आइज़नकोट। पूर्व सेनाध्यक्ष, जिसका बेटा गाल दिसंबर 2023 में गाज़ा में मारा गया था। जिस आदमी ने अठारह साल सरकार चलाई, उसके पास छियालीस सिफ़ारिशें हैं, और उसकी अपनी धार्मिक पार्टी ने उसका नाम लेने से इनकार कर दिया। कल रविवार को राष्ट्रपति तय करेंगे कि सरकार बनाने का काम किसे मिले। आइज़नकोट की राह अब भी आसान नहीं है, उसके समर्थकों में से तीन पार्टियाँ अरब पार्टियों के साथ बैठने को तैयार नहीं। पर दृश्य देखिए। एक देश जो नौ महीने से ईरान के साथ युद्ध में है, वह अपना नेतृत्व उस आदमी को सौंपने की तैयारी में है जिसने युद्ध की कीमत अपनी आँखों से देखी है, और जिसने इसीलिए एक साल पहले यशार नाम की पार्टी बनाई थी, जिसका अर्थ है सीधा।
दृश्य दो। वाशिंगटन। उसी युद्ध का दूसरा साझेदार। उसकी पार्टी मंगलवार को हार गई। कल ख़बर आई कि विदेश मंत्री रूबियो उसका साथ छोड़ सकते हैं, और उपराष्ट्रपति वेंस दूरी बना रहे हैं, जिन्होंने लिखित में कह दिया कि युद्ध ने हरवाया। कमरे से लोग निकल रहे हैं। वह बैठा है और कह रहा है, मौक़ा मिले तो फिर करूँगा। उसी कमरे के बाहर एलन मस्क, जिनकी संपत्ति इस हफ़्ते गिरी, एक नई चिंता लेकर खड़े हैं। उन्होंने कल दुनिया को चेताया कि भारत की जन्म-दर “ख़तरे की रेखा” से नीचे चली गई, प्रतिस्थापन स्तर से कम। दुनिया का सबसे अमीर आदमी भारत के बच्चों की संख्या गिन रहा है।
दृश्य तीन। भारत। कल दीपावली है। बाज़ार में सोना लाख रुपये से उपर है। और उसी बाज़ार के किनारे वह बच्चा अब भी बैठा है जिसके बारह दीये दस रुपये के हैं। मस्क को उसकी चिंता है, कि उसके जैसे बच्चे कम पैदा हो रहे हैं। कल के अख़बार में एक और ख़बर थी: 2036 तक प्राथमिक स्कूलों में बच्चे बीस प्रतिशत कम हो सकते हैं। किसी ने यह नहीं लिखा कि जो बच्चे हैं, उनमें से कितने स्कूल की जगह दीये बेच रहे हैं। दुनिया भारत के बच्चों की गिनती को लेकर चिंतित है। भारत अपने बच्चों की गिनती को लेकर नहीं।
और दृश्य चार, जो सबसे चुप है। आज सुबह निर्वाचन आयोग ने कहा कि SIR में जिनके नाम छूट गए, वे अब जुड़वा सकेंगे। यह उस हफ़्ते की तीसरी वापसी है, पहले घोषणा-पत्र उतरा, फिर काम का बँटवारा बदला, अब दरवाज़ा खुला। आज मैं सूची पर नहीं लिखूँगा, वादा किया था। बस इतना कि जिस दरवाज़े को बंद करने के लिए डेढ़ साल और तेरह करोड़ नाम लगे, उसे खोलने के लिए एक अदालत का एक सवाल काफ़ी था। दरवाज़ा खुल गया है। कल दीपावली है। जाकर अपना दीया वहाँ भी रख आइए।
अब चारों दृश्य एक साथ।
यरुशलम में एक पिता, जिसने बेटे को युद्ध में खोया, शांति का ज़िम्मा लेने जा रहा है। वाशिंगटन में एक राष्ट्रपति, जिसने किसी को नहीं खोया, युद्ध को सही कह रहा है और उसके अपने लोग उसे छोड़ रहे हैं। एक अरबपति भारत के बच्चों की संख्या पर चिंतित है। और भारत में एक बच्चा दीये बेच रहा है जिसकी गिनती किसी को नहीं चाहिए, सिर्फ़ उसकी संख्या चाहिए।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि किसी राष्ट्र की महानता इस बात से नहीं नापी जाती कि उसके पास कितने लोग हैं, इस बात से नापी जाती है कि वह अपने सबसे कमज़ोर व्यक्ति के साथ क्या करता है। और उन्होंने यह भी कहा था कि जिस देश में बच्चे भूखे हों, वहाँ मंदिर बनाना पाप है। मस्क की चिंता संख्या की है। विवेकानंद की चिंता उस एक बच्चे की थी। दोनों एक ही देश की बात कर रहे हैं, पर एक उसे बाज़ार की तरह देख रहा है, दूसरा उसे माँ की तरह देखता था।
गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के एक व्याख्यान का शीर्षक है “भावी देवासुर संग्राम और उसकी भूमिका”। वे कहते हैं कि असली युद्ध देशों के बीच नहीं, हर समाज के भीतर होता है, उस प्रवृत्ति के बीच जो गिनती करती है और उस प्रवृत्ति के बीच जो गले लगाती है। कल यरुशलम में एक पिता उस युद्ध में अपना पक्ष चुनेगा। वाशिंगटन में एक आदमी चुन चुका है। और हम, जो कल दीये जलाएँगे, हमारा पक्ष उस बच्चे के टाट के सामने तय होगा, रुककर या गुज़रकर।
दुनिया इस सप्ताह थक कर शांति की ओर मुड़ी है। हम त्योहार की ओर मुड़े हैं। दोनों एक ही चीज़ ढूँढ रहे हैं, रोशनी। फ़र्क़ बस इतना है कि एक ने उसकी कीमत अपने बेटे से चुकाई है, और हम उसे दस रुपये में बारह ख़रीद रहे हैं।
कल दीया जलाते समय एक पल सोचिएगा, आपकी रोशनी किसकी कीमत पर है, और किसके हिस्से में।
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