सियासत दर्पण न्यूज़,,,कल रात दुनिया के सबसे ताक़तवर आदमी की पार्टी हार गई। सुबह तक नतीजे आ गए। किसी ने मतदाता-सूची के सॉफ़्टवेयर को ट्रेड सीक्रेट नहीं कहा, किसी ने “सर्वसम्मति” का हलफ़नामा नहीं दिया, और हारने वाले ने गिनती छोड़कर घर जाने के बजाय सिर्फ़ इतना कहा कि यह मेरी हार नहीं है। लोकतंत्र में इतना झूठ चल जाता है। बाकी नहीं चलता।
अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेट्स ने सदन और सीनेट दोनों जीत लिए। सात सीनेट सीटें पलटीं। टेक्सास, जो बत्तीस साल से लाल था, नीला हो गया। मेन में वह सीनेटर हारीं जो तीस साल से नहीं हारी थीं। और मिशिगन से अब्दुल अल-सैयद अमेरिका के इतिहास के पहले मुस्लिम सीनेटर बने, उसी देश में जिसके राष्ट्रपति ने अपने पहले कार्यकाल में मुस्लिम देशों पर यात्रा-प्रतिबंध लगाया था। एग्ज़िट पोल कहते हैं कि राष्ट्रपति की स्वीकृति अड़तीस प्रतिशत है, मध्यावधि के इतिहास में सबसे कम। जनवरी में इसी राष्ट्रपति ने चुनाव टालने की बात उछाली थी। चुनाव टला नहीं। जनता आई, और जवाब देकर चली गई।
मैं अमेरिका का प्रशंसक नहीं हूँ, और वहाँ के लोकतंत्र में भी हज़ार छेद हैं। पर आज एक बात पर रुकना ज़रूरी है। वहाँ सबसे ताक़तवर आदमी को उसकी ही जनता ने एक मंगलवार की रात सीमा दिखा दी, और बुधवार सुबह दुनिया को पता था कि किसने कितने वोट पाए, किस बूथ पर, किस सॉफ़्टवेयर से गिने गए। हार कड़वी थी, गिनती साफ़ थी।
अब अपना देश।
कल सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग के पास मतदाता को सज़ा देने का अधिकार है। पीलीभीत में अंतिम सूची छपने के बाद दस हज़ार चार सौ सत्तर प्रविष्टियाँ बदल दी गईं, वह भी बिना फ़ॉर्म के, और सीट सात हज़ार से जीती गई थी। दिल्ली में सैंतालीस लाख नाम ड्राफ़्ट से बाहर और “अंतिम” तारीख़ चार बार आगे। सॉफ़्टवेयर का नाम ट्रेड सीक्रेट। और आज, चार नवंबर, वह तारीख़ है जब 1948 में बाबासाहेब ने संविधान का प्रारूप पेश करते हुए कहा था कि संविधान जितना अच्छा हो, चलाने वाले बुरे निकले तो बुरा साबित होगा। अठहत्तर साल बाद अमेरिका ने कल रात दिखाया कि चलाने वाला बुरा निकले तो जनता क्या करती है। और हम आज भी इस पर बहस कर रहे हैं कि जनता गिनी जाएगी या नहीं।
और भोपाल।
बीस अक्टूबर को पुलिस ने रोशनपुरा चौराहे पर दो महीने के लिए हर धरना, प्रदर्शन और जुलूस वर्जित किया था, यातायात और एम्बुलेंस के नाम पर। आज उसी चौराहे पर “लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ” पदयात्रा पहुँची, चालीस से पचास हज़ार लोग, केंद्रीय मंत्री आगे, मुख्यमंत्री साथ, और धनतेरस से भाई दूज तक शहर के रास्ते बदले हुए। आदेश अब भी टँगा है। आज पता चला कि वह आदमी नहीं पढ़ता, पार्टी पढ़ता है। मंच से कहा गया कि विपक्ष ईवीएम हैक करके दिखाए। ठीक। आयोग अपने सॉफ़्टवेयर का नाम बता दे, चुनौती मैं भी रखता हूँ।
अब तीनों को एक पंक्ति में रखिए। वाशिंगटन में राष्ट्रपति हारा और सुबह तक सबको पता था। दिल्ली में अदालत पूछ रही है कि नागरिक को सज़ा दी जा सकती है या नहीं। भोपाल में प्रतिबंधित चौराहे पर सत्ता की पदयात्रा है। एक जगह जनता ताक़त को गिन रही है। एक जगह ताक़त जनता को गिन रही है। और एक जगह ताक़त ख़ुद को “लोकतंत्र बचाने” के लिए गिन रही है।
फ़र्क़ सॉफ़्टवेयर का नहीं है। फ़र्क़ इस बात का है कि गिनती किसके डर से होती है। अमेरिका में कल रात व्यवस्था जनता से डरी। यहाँ जनता दादा का जन्म-प्रमाणपत्र ढूँढ रही है।
सत्ता का चरित्र इस बात से पता चलता है कि वह हार को कैसे लेती है। कल रात अमेरिका ने एक परीक्षा दी। सत्रह नवंबर को हमारी अदालत में हमारी परीक्षा है। और उससे पहले, पच्चीस नवंबर तक, दिल्ली के हर कटे नाम की।
अमेरिका ने कल रात अपना सबसे ताक़तवर आदमी गिन लिया। हम अपना सबसे कमज़ोर नागरिक कब गिनेंगे?
साभार
डॉ. पुरुषोत्तम मेघवाल





