बिलासपुर।(सियासत दर्पण न्यूज़) आपराधिक शिकायत में शादी का वीडियो, बातचीत की आवाज की रिकॉर्डिंग और फोरेंसिक सलाहकार की रिपोर्ट को अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति नहीं मिलने के मामले में हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि शिकायत की शुरुआती सुनवाई के दौरान अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अर्जी खारिज करने का आदेश अंतरिम प्रकृति का है। इसके खिलाफ पुनरीक्षण याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी। हालांकि, याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के आदेश को कानून के अनुसार फिर चुनौती देने की स्वतंत्रता दी गई है।
जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू ने 27 अक्टूबर 2026 को दुर्ग की डॉ. नीलम गायकवाड़ की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया।
शिकायत के बाद तैयार हुई थी फोरेंसिक रिपोर्ट
मामले के अनुसार, डॉ. नीलम गायकवाड़ ने 2 जुलाई 2025 को उदय सिंह जोशी, फमेंद्र सिंह जोशी और चंपी देवी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें धोखाधड़ी, विश्वासघात, धमकी और कूटरचना सहित अन्य आरोप लगाए गए थे। 25 अगस्त 2025 को मजिस्ट्रेट के सामने उनके प्रारंभिक बयान दर्ज हुए और उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में दस्तावेज पेश किए।
बाद में उन्होंने एक पेन ड्राइव पेश करने की अनुमति मांगी। इसमें शादी का वीडियो, आरोपितों के साथ बातचीत की मोबाइल फोन रिकॉर्डिंग और फोरेंसिक सलाहकार की रिपोर्ट शामिल थी। यह रिपोर्ट उन्हें 24 अप्रैल 2026 को मिली थी।
मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज करते हुए कहा कि मूल शिकायत और प्रारंभिक बयान में वीडियो या आवाज की रिकॉर्डिंग को फोरेंसिक जांच के लिए भेजने का कोई उल्लेख नहीं है। इस स्तर पर अतिरिक्त साक्ष्य लेने से कार्यवाही लंबी खिंच सकती है।
सत्र न्यायालय ने भी नहीं सुनी थी पुनरीक्षण याचिका
मजिस्ट्रेट के 30 जून 2026 के आदेश को डॉ. गायकवाड़ ने आठवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, दुर्ग के समक्ष चुनौती दी। सत्र न्यायालय ने 18 सितंबर 2026 को पुनरीक्षण याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अर्जी अस्वीकार करने का आदेश अंतरिम प्रकृति का है, इसलिए उसके खिलाफ पुनरीक्षण नहीं किया जा सकता।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत याचिका दायर की। उनके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि फोरेंसिक रिपोर्ट शिकायत दर्ज होने के बाद तैयार हुई थी, इसलिए उसका उल्लेख मूल शिकायत या प्रारंभिक बयान में संभव नहीं था।
अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने से शिकायतकर्ता को अपने आरोपों के समर्थन में महत्वपूर्ण सामग्री रखने का अवसर मिलता। उन्होंने यह भी कहा कि इस आदेश से उनके अधिकार प्रभावित हुए हैं, इसलिए इसे केवल अंतरिम आदेश नहीं माना जा सकता।
साक्ष्य लेने से इन्कार को माना अंतरिम आदेश
हाई कोर्ट ने कहा कि अंतरिम आदेश का निर्धारण केवल इस आधार पर नहीं होता कि वह कार्यवाही के किस चरण में पारित हुआ है। यह देखना जरूरी है कि उससे पक्षकारों के अधिकारों पर कितना प्रभाव पड़ता है और क्या आदेश से पूरी कार्यवाही समाप्त होती है।
सुप्रीम कोर्ट के अमरनाथ, मधु लिमये, सेथुरामन और अन्य फैसलों के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मजिस्ट्रेट ने केवल कुछ अतिरिक्त साक्ष्य अभिलेख पर लेने से इन्कार किया है। इससे मूल शिकायत की कार्यवाही समाप्त नहीं हुई है और न ही किसी पक्ष के अधिकारों का अंतिम निर्णय हुआ है।
कोर्ट ने माना कि सत्र न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानकर सही किया। इसलिए निचली अदालतों के आदेशों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने डॉ. गायकवाड़ को मजिस्ट्रेट के 30 जून 2026 के आदेश को कानून के अनुसार चुनौती देने की स्वतंत्रता दी।






