*साल 1972 की बात है। रमज़ान का महीना था।रफी साहब का रोज़ा था,और वो गाना,,,,,,दोबारा रिकॉर्ड किया।*

सियासत दर्पण न्यूज़,,साल 1972 की बात है। रमज़ान का महीना था। मुंबई के ‘फेमस स्टूडियो’ में एक गाने की रिकॉर्डिंग चल रही थी। रफी साहब और लता जी गाना रिकॉर्ड कर रहे थे। जिस फिल्म के गीत की रिकॉर्डिंग चल रही थी उससे एक बहुत बड़े स्टार का उदय होने वाला था। लता जी व रफी साहब ने कई टेक्स में ये गाना गया और संगीतकार जोड़ी कल्याणजी – आनंदजी ने भी उन टेक्स को ओके कर दिया था। लेकिन लता जी खुश नहीं थी। उन्हें लग रहा था कि कहीं ना कहीं कोई कमी तो रह गई है। उन्हें अपने गायन में कुछ और इंप्रूवमेंट की गुंजाइश नज़र आ रही थी। लता जी ने कल्याणी – आनंदजी से एक और टेक लेने को कहा। वो मान गए। उन्होंने रफी साहब से भी एक बार और गाना रिकॉर्ड करने की गुज़ारिश की।
रफी साहब का रोज़ा था। ज़ाहिर है उस दिन उन्होंने कुछ भी खाया – पिया नहीं था। उनका गला पूरी तरह से सूख चुका था। रोज़ा खत्म होने में 1 घंटा ही बचा था। वो जल्द से जल्द घर जाना चाहते थे। इसलिए वो दोबारा गाने के मूड में बिल्कुल भी नहीं थे। जब कल्याणजी – आनंदजी ने उनसे एक दफा और गाने को कहा तो रफी साहब थोड़ा नाराज़ हुए। उन्होंने कहा कि जब गाना ओके हो चुका है तो दोबारा गाने की क्या ज़रूरत है? वो जाकर अपनी गाड़ी में बैठ गए। तब फिल्म के एक गीतकार दौड़कर रफी साहब के पास गए। उन्होंने रफी साहब से पूछा “रफी साहब, आप जानते हैं ये गाना किस पर फिल्माया जाएगा?” रफी साहब ने कहा ने इरिटेट होकर जवाब दिया “क्या दिलीप कुमार पर पिक्चराइज़्ड होगा ये गाना?” तब उस गीतकार ने रफी साहब से कहा ”आपके इस खादिम पर।”
रफी साहब हैरान हो गए। और उनका गुस्सा भी एक पल में काफूर हो गया। उन्होंने गीतकार से कहा,”अरे। तूने मुझे पहले क्यों नहीं बताया। चल फटाफट स्टूडियो में चल।” जब रफी साहब स्टूडियो में आए तब तक सभी म्यूज़िशियन्स स्टूडियो से बाहर आ चुके थे। रफी साहब ने खुद सबको दोबारा स्टूडियो में चलने को कहा। और फिर लता जी को भी साथ लेकर वो स्टूडियो में गए।। उन्होंने दो टेक में गाना रिकॉर्ड किया। और इस दफा उन्होंने अपनी आवाज़ कुछ इस तरह से मॉड्यूल की कि वो उस गीतकार पर एकदम फिट लगे। वो गीत था जंजीर फिल्म का,”दीवाने हैं दीवानों को ना घर चाहिए, ना दर चाहिए, मुहब्बत भरी एक नज़र चाहिए।” और फिल्म थी जंजीर। वो ज़जीर जिसने हिंदी सिनेमा को अमिताभ बच्चन नाम का स्टार ऑफ दि मिलेनियम दिया। और वो गीतकार जिसकी गुज़ारिश पर रफी साहब ने दोबारा वो गीत रिकॉर्ड किया था, वो थे गुलशन बावरा। गुलशन बावरा ने ही ज़ंजीर फिल्म का कालजयी गीत ‘यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी’ भी लिखा था।’
12 अप्रैल 1937 को गुलशन बावरा जी का जन्म लाहौर के पास स्थित शेखपुरा नामक कस्बे में हुआ था। आज ये जगह पाकिस्तान में है और अब कस्बे से शहर बन चुकी है। गुलशन बावरा जी का पूरा नाम गुलशन कुमार मेहता था।
गुलशन कुमार मेहता से गुलशन बावरा कैसे बने? ये किस्सा भी दिलचस्प है, साल 1959 में आई चंद्रसेना वो पहली फिल्म थी जिसमें कल्याणजी – आनंदजी वाले कल्याणजी ने गुलशन जी को बतौर गीतकार पहला ब्रेक दिया था। उस फिल्म के क्रेडिट्स में इनका नाम गुलशन लिखा गया था। इसी साल आई एक और फिल्म सट्टा बाज़ार आई, इसके लिए भी गुलशन जी को गीत लिखने का मौका मिला। मीना कुमारी और बलराज साहनी स्टारर उस फिल्म में गुलशन जी ने दो गीत लिखे थे। जब सट्टा बाज़ार फिल्म पर काम शुरू हुआ तो इसके डिस्ट्रीब्यूटर को गुलशन बावरा जी से मिलवाया गया। डिस्ट्रीब्यूटर जानना चाहता था कि फिल्म के लिए गीत लिख रहा गुलशन का नाम का आदमी कौन है। वो डिस्ट्रीब्यूटर जब गुलशन जी से पहली दफा मिला तो उसे बड़ा अजीब लगा। इनके बाल बिखरे हुए थे। और इन्होंने कपड़े भी कुछ अजीब तरह के पहने हुए थे। उस डिस्ट्रीब्यूटर को यकीन ही नहीं हुआ कि ये आदमी गीत लिख सकता है। उसने कहा,”अरे ये तो बावरा लगता है बावरा। ये क्या गीत लिखेगा।” बस। मिल गया गुलशन के नाम को बावरा। और ये हो गए गुलशन बावरा।
गुलशन बावरा जी गीतकार होने के साथ-साथ बहुत अच्छे एक्टर भी थे। उन्होंने कई फिल्मों में चरित्र किरदार निभाए थे।

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