Home / छत्तीसगढ़ / *”मतांतरण विवाद पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: घर में प्रार्थना या मीटिंग करने वालों को न परेशान करें”*

*”मतांतरण विवाद पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: घर में प्रार्थना या मीटिंग करने वालों को न परेशान करें”*

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बिलासपुर। (सियासत दर्पण न्यूज़) छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने प्रदेश में मतांतरण को लेकर विवाद के बीच अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि किसी व्यक्ति को अपने निजी आवास में शांतिपूर्ण प्रार्थना सभा आयोजित करने का अधिकार है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रार्थना सभा के लिए पहले से अनुमति लेना जरूरी नहीं है।

इस फैसले के साथ ही सिंगल बेंच ने पुलिस की ओर से जारी नोटिस को रद कर दिया है, जिसमें थाना प्रभारी याचिकाकर्ताओं को प्रार्थना सभा रोकने के लिए बार-बार नोटिस दे रहे थे। हाई कोर्ट ने पुलिस से कहा कि याचिकाकर्ताओं को अनावश्यक परेशान न किया जाए। मामला जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम गोधना से जुड़ा है।

जांजगीर जिले के गोदना निवासी बद्री प्रसाद साहू व राजकुमार साहू ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर पुलिस थाना नवागढ़ द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता ग्राम गोधन, तहसील एवं थाना नवागढ़, जिला जांजगीर-चांपा में अपने-अपने आवास के वैध स्वामी हैं।

दोनों याचिकाकर्ता आपस में रिश्तेदार हैं और उन्होंने अपने मकान की पहली मंजिल पर एक हाल बनाकर 2016 से ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए प्रार्थना सभा आयोजित करते हैं।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता प्रीतम सिंह ने सिंगल बेंच को बताया कि इन सभाओं में किसी प्रकार की अवैध गतिविधि या शांति भंग नहीं होती, इसके बावजूद थाना नवागढ़ द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 94 के तहत बार-बार नोटिस जारी कर प्रार्थना सभा पर रोक लगाने का प्रयास किया जा रहा है। अधिवक्ता ने बताया कि ग्राम पंचायत गोधन द्वारा पहले जारी नो आब्जेक्शन सर्टिफिकेट को भी दबाव में वापस ले लिया गया है।

राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए शासकीय अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं और वे जेल भी जा चुके हैं। शासकीय अधिवक्ता ने नियमों का हवाला देते हुए कोर्ट को बताया कि प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी से कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए पुलिस द्वारा नोटिस जारी किया गया है। राज्य सरकार की ओर से पैरवी कर रहे शासकीय अधिवक्ता ने जवाब दाखिल करने के लिए समय भी मांगा।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने निजी मकान में वर्ष 2016 से प्रार्थना सभा आयोजित कर रहे हैं और ऐसा करने पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि प्रार्थना सभा के दौरान शोर-शराबा, कानून-व्यवस्था की समस्या या किसी प्रकार का उल्लंघन होता है, तो संबंधित प्राधिकरण विधि के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन केवल प्रार्थना सभा आयोजित करने के आधार पर हस्तक्षेप उचित नहीं है।

अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं के नागरिक अधिकारों में हस्तक्षेप न करें और न ही जांच के नाम पर उन्हें परेशान करें। कोर्ट ने 18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और एक फरवरी 2026 को जारी सभी नोटिसों को निरस्त कर दिया गया।

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