सुकमा । (सियासत दर्पण न्यूज़) छत्तीसगढ़ के जंगलों में लोगों की चहलकदमी तब अचानक से बढ़ गई जब तेलंगाना भाजपा द्वारा दावा किया गया कि ‘मआवोदी पापाराव नहीं रहा’। छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशकों से गूंजती गोलियों की तड़तड़ाहट अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचती नजर आ रही है। लाल गलियारे में जिस खौफ का साया कभी गहरा हुआ करता था, अब उस रक्तरंजित अध्याय का आखिरी पन्ना पलटने के लिए सुरक्षा बलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र है ‘पापाराव’, वह अंतिम बड़ा माओवादी कमांडर जिसे अब बस्तर के घने जंगल भी सुरक्षित पनाह देने में नाकाम साबित हो रहे हैं। सुकमा जिले के किस्ताराम इलाके के निमलगुड़ा गांव का रहने वाला यह 52-55 वर्षीय शख्स, सुरक्षा बलों की फाइलों में सुनम चंद्रया, मंगू दादा और चंद्रन्ना जैसे कई नामों से दर्ज है। पापाराव महज एक नाम नहीं, बल्कि माओवादी रणनीतियों का एक मंझा हुआ खिलाड़ी है, जो वर्तमान में वेस्ट बस्तर डिवीजन के प्रभारी और स्टेट जोनल कमेटी मेंबर (SZCM) जैसे ऊंचे पद पर बैठा है। इसकी खतरनाक रणनीतियों और युद्ध कौशल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शासन ने इसके सिर पर 25 लाख रुपये का भारी-भरकम इनाम रखा है।








