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*रायपुर मर्डर केस: हाईकोर्ट ने Flipkart की याचिका खारिज की*

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बिलासपुर। (सियासत दर्पण न्यूज़) हाई कोर्ट ने फ्लिपकार्ट के अधिकारियों द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआइआर और चार्जशीट को निरस्त करने से इनकार कर दिया है। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल के डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि जब प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के तत्व सामने आ रहे हों, तो हाई कोर्ट को जांच या ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हत्या और लूट मामले में फ्लिपकार्ट कर्मियों पर हुई थी कार्रवाई

जुलाई 2025 में रायपुर के मंदिर हसौद थाना क्षेत्र में हुई एक हत्या और लूट की घटना के बाद पुलिस ने ऑनलाइन शापिंग साइट फ्लिपकार्ट और लाजिस्टिक पार्टनर (इलास्टिक रन) के मैनेजर, डिस्ट्रीब्यूटर सहित छह कर्मचारियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी की थी। हत्या के आरोपितों ने फ्लिपकार्ट के माध्यम से चाकू मंगाया था, जिसका इस्तेमाल हत्या में किया गया।

पुलिस का आरोप है कि फ्लिपकार्ट के अफसरों को पहले से चेतावनी दी गई थी कि वे ऐसे हथियारों की डिलीवरी न करें, फिर भी उन्होंने लापरवाही बरती, जिससे मानवीय जीवन खतरे में पड़ा। गिरफ्तारी के बाद अधिकारियों ने याचिका दायर कर एफआइआर और चार्जशीट को रद करने की मांग की।

आर्म्स एक्ट के दायरे में नहीं है किचन नाइफ

उनके वकीलों ने तर्क दिया कि उनकी कंपनी एक इंटरमीडियरी है और आइटी एक्ट की धारा 79 के तहत संरक्षित है। बेचे गए चाकू साधारण किचन नाइफ थे, जो आर्म्स एक्ट के दायरे में नहीं आते। आरोप मनगढ़ंत हैं और कंपनी के प्रबंधकीय अधिकारियों पर अप्रत्यक्ष जिम्मेदारी थोपी जा रही है, जबकि उनका व्यक्तिगत रूप से इस अपराध में कोई हाथ नहीं है।

राज्य सरकार का तर्क

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि आरोपितों ने पुलिस द्वारा दी गई चेतावनियों के बावजूद खतरनाक वस्तुओं की डिलीवरी को सुगम बनाया। पुलिस जांच में पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद चार्जशीट दाखिल की गई है।

नजीर का हवाला देकर कोर्ट ने याचिका खारिज की

हाई कोर्ट ने नेहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि जांच के शुरुआती चरणों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि क्या याचिकाकर्ताओं को इस घटना का ज्ञान था और क्या उनकी लापरवाही ने अपराध को बढ़ावा दिया, यह ऐसे तथ्य हैं जिन पर ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर ही निर्णय लिया जा सकता है। जब आरोप बेतुके या असंभव न हों, तो एफआईआर रद करने की शक्ति का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इस निर्णय के साथ ही हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

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